डॉक्टर के पास जाने से पहले
अपने लक्षण लिख लें: क्या हो रहा है, कब शुरू हुआ, कितनी बार होता है, किस चीज़ से बेहतर या बदतर होता है।
आप जो भी दवाइयाँ, सप्लीमेंट या घरेलू नुस्खे लेते हैं, कोई एलर्जी हो, और परिवार की सेहत से जुड़ा ज़रूरी इतिहास, इन सबकी सूची बना लें।
पुराने पर्चे (प्रिस्क्रिप्शन) और रिपोर्ट साथ लाएँ, या उन्हें अपने फ़ोन या हेल्थ रिकॉर्ड ऐप में तैयार रखें।
डॉक्टर से मिलते समय
ईमानदारी से बताएँ। डॉक्टर सब तरह की बातें सुन चुके होते हैं, और आपकी मदद के लिए उन्हें पूरी तस्वीर चाहिए।
काम के सवाल: आपके हिसाब से इसकी वजह क्या है? क्या मुझे कोई जाँच करवानी है, और क्यों? यह दवा मुझे कैसे लेनी है? मुझे किन साइड इफ़ेक्ट पर ध्यान रखना है? मुझे दोबारा कब आना चाहिए?
आप डॉक्टर से अकेले में बात करने के लिए कह सकते हैं, और जाँच के दौरान किसी और को साथ रखने (शैपरोन) के लिए भी कह सकते हैं।
लैब रिपोर्ट पढ़ना
ज़्यादातर रिपोर्ट में आपका नतीजा, उसकी इकाई (यूनिट), और एक रेफ़रेंस रेंज होती है, यानी वह दायरा जो ज़्यादातर स्वस्थ लोगों में दिखता है। इस दायरे से बाहर के नतीजों पर ज़्यादा के लिए H (हाई) या कम के लिए L (लो) लिखा हो सकता है।
रेफ़रेंस रेंज लैब, उम्र और लिंग (सेक्स) के हिसाब से अलग होती है। दायरे से थोड़ा बाहर का नतीजा अक्सर कोई समस्या नहीं होता, और दायरे के अंदर का नतीजा हर बात को खारिज नहीं कर देता।
नतीजों को आपके लक्षणों और इतिहास के साथ मिलाकर समझना होता है, इसीलिए उनका मतलब आपके डॉक्टर को ही बताना चाहिए।
डॉक्टर से मिलने के बाद
बताए गए प्लान का पालन करें, इलाज बताए अनुसार पूरा करें, और अपनी रिपोर्ट सँभालकर रखें, जैसे किसी फ़ोल्डर में या अपने ABHA (आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट) हेल्थ रिकॉर्ड में।
अगर लक्षण बिगड़ें या नए लक्षण दिखें, तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें। हर नतीजे को ऑनलाइन खोजने और खुद से इलाज करने से बचें।