तनाव ज़िंदगी का हिस्सा है
तनाव दबाव के प्रति आपके शरीर की प्रतिक्रिया है। बोर्ड परीक्षा या किसी मैच से पहले थोड़ा तनाव आपको ध्यान लगाने में मदद कर सकता है।
बहुत ज़्यादा तनाव, बहुत लंबे समय तक रहे तो नींद, भूख, ध्यान और मूड पर असर डाल सकता है, और सिरदर्द या पेट दर्द भी कर सकता है।
भारतीय किशोरों में तनाव की आम वजहें हैं: परीक्षाएँ, कोचिंग, कज़िन्स से तुलना, करियर को लेकर परिवार की उम्मीदें, दोस्ती, और घर में पैसों की चिंता।
जब तनाव एंग्ज़ाइटी बन जाए
एंग्ज़ाइटी तब होती है जब चिंता हालात से कहीं बड़ी लगे, लंबे समय तक बनी रहे, या आपको रोज़ के काम करने से रोके।
इसके संकेतों में शामिल हैं: दिमाग़ में तेज़ी से दौड़ते ख़याल, दिल की धड़कन तेज़ होना, जी मिचलाना, स्कूल या लोगों से बचना, नींद न आना, या अचानक घबराहट (पैनिक) के दौरे।
एंग्ज़ाइटी आम है और इसका इलाज हो सकता है। यह कमज़ोरी नहीं है, और आपको इससे अकेले नहीं निपटना है।
निपटने के कारगर तरीके
धीरे-धीरे साँस लीजिए: चार गिनती तक साँस अंदर, एक पल रोकिए, छह गिनती तक बाहर। शरीर को शांत करने के लिए इसे कुछ बार दोहराइए।
बड़े कामों को छोटे-छोटे कदमों में बाँटिए। पढ़ाई का ऐसा टाइमटेबल बनाइए जिसमें ब्रेक, खाने और नींद का समय भी शामिल हो।
हर दिन शरीर को हिलाइए-डुलाइए, नींद का समय तय रखिए, और देर रात तक स्क्रॉल करना और चाय, कॉफ़ी या एनर्जी ड्रिंक्स से बहुत ज़्यादा कैफ़ीन लेना कम कीजिए।
अपनी चिंताएँ लिख लीजिए, फिर ख़ुद से पूछिए: मेरे बस में क्या है? मैं क्या छोड़ सकता/सकती हूँ?
किसी से बात कीजिए
माता-पिता, बड़े भाई-बहन, टीचर, स्कूल काउंसलर या दोस्त से बात करने से आप कम अकेला महसूस कर सकते हैं।
अगर परिवार की उम्मीदें बहुत भारी लगती हैं, तो उन्हें बताना कि आप कैसा महसूस करते हैं, मदद कर सकता है। बहुत-से माता-पिता मदद करना चाहते हैं, पर उन्हें पता नहीं होता कि आप पर कितना दबाव है।
काउंसलर, साइकोलॉजिस्ट (मनोवैज्ञानिक) और डॉक्टर आपको तरीके सिखा सकते हैं और, ज़रूरत हो तो, इलाज दे सकते हैं। मदद माँगना एक मज़बूत फ़ैसला है।